Sunday, 5 April 2026

काव्य

 शीर्षक - सुबह और सवेरा


लिख कर तेरी बात को डायरि मे, 

गढ़ता हूँ यादें इसी शायरी में ! 


अनजाने  हम थे वो नादान बातेँ, 

ना झुकती थी पलकें ना मिलती थी आखें।


वो बातेँ हज़ारो जो बेकाम की थी, 

कहानी वो किस्से सब बेनाम की थी। 


खिड़की से तक कर वो हर शाम मिलना, 

एक दूजे से मिलकर वो चेहरों का खिलना। 


गाड़ी पे सट कर बनाना वो दूरी, 

रातें थी पूरी पर बातेँ अधूरी। 


बातों मे फ़िर भी अदबे अदब थी, 

करीबी जो थी वो मुत्तफ़िक़ भरी थी।

(मुत्तफ़िक़ - consent) 


ये दूरी जो अब तक बेकाम की थी, 

बातें तुम्हारी एक जो शाम सी थी। 

ये बढ़ने लगीं है........ 

ये ढलने लगी है....... 


नयी सुबह जीवन मे आ अब गयी है! 

नयी सुबह जीवन मे आ अब गयी है, 

सुना है तुम्हारा भी नया एक सवेरा है।


सुबह की ये खुशबु बूरी तो नहीं थी! 

तुम्हारी भी मुझमे कहीं तो कमी थी। 


तुम्हारे सवेरे मे शबनम थी बिखरी, 

ख़बर है मुझे भी तू ख़ुश तो नहीं थी। 


सुबह की आभा भी बढ़ने लगी है। 

संध्या के तम को वो हरने लगी है। 


सुना है सवेरा भी भाने लगा है! 

तुम्हारे तिमिर को मिटाने लगा है। 


चाहा था जिसको वो मेरा नहीं है, 

जो मेरा है उसको मैं चाहने लगा हूँ। 


समझो ये तुम भी यही तो सही है, 

 प्रारब्ध का तेरे जीवन  वही है। 

  और 

मेरे भी सुबह की नियति यही है......... 

तेरे भी जीवन की नियति वहीं है........